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बुधवार, 29 फ़रवरी 2012

इक अमर प्रेम की दास्तान


अबकी पतझड़ शायद हम भी उजड़ेंगे 
आपकी वो तेज़ हवाओं में 
उन पत्तों की तरह 
जो बिखरे है हर बागों के ढेर में

वो पतझड़  में बिखरे पत्तों में उड़ते 
मेरे मन की वो उलझन
उजड़े पेड़ों के क्या रह गई है?


टूटे पत्तों की बिखरे ढेर में मिलेंगे हम
ये हवा कहाँ से कहाँ ले गई
अब कहाँ मिलेंगे हम?

वो पतझड़  में बिखरे पत्तों में उड़ते
मेरे मन की वो उलझन
छाया क्या है ?
उन उजड़े पेड़ों के
तने से पूछो जिसने सहा हो
अपने जिगर के टुकड़े को
अपने दिल से जुदा होने का गम


हर पत्तों की ये तमन्ना
बिछड़ने  का गम ना हो अपने साथी को
इसलिए हमेशा ये दुआ करना
" जा तुझे फिर से  सुखी संसार मिले "


बिछड़े यार कि दुआ भी बड़े काम आई
ये देखो फिर एक सुबह आई

एक नए सुबह की शुरुआत
नए साथी का मिलन,
हर डाल पर उमड़ रहा तन मन

वो नयी प्रफुलित होती
कोमल पल्लव की लालायित होती वो फूट
नए जन्म का  उत्सव मनाती
बहारों में गाते 
हर डाल डाल पर पुदकते बुलबुल की वो गीत
जैसे कह रही हो इक अमर प्रेम की दास्तान

बसंती जगत की ये अमर प्रेम  की दास्ताँ  कभी ख़त्म नहीं होगी.... 

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