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बुधवार, 3 अक्टूबर 2012

सोच किस तेज़ी से बढ़ रही है

क्या हो रहा है और क्यों हो रहा है ?
सोच किस तेज़ी से बढ़ रही है
अमीर -  गरीब  और ये सरकारी नीति
आज ये मुद्दा नहीं कि  मुद्रास्फीति की दर किस तेज़ी से बढ़ रही या घट रही है? 
या फिर सरकार क्यों महंगाई बढ़ा रही है? 
मुद्दा ये है कि सोच किस तेज़ी से बढ़ रही है और बदल रही है

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सभी अमीरों की तो मैं  नहीं कह सकता  पर एक मेरा दोस्त है जिसे मैं अमीर की श्रेणी में  रख रहा हूँ उसे  पहले तीस हज़ार रुपये महीने मिलता था आज उसे  लगभग  नब्बे हज़ार रुपये वेतन  मिलते है उनका अपना एक दुकान भी है और उनकी गाड़ी भी चलती है  कहा जाये तो एक संम्पन अमीर है पर उनके सोच में कोई खास बदलाव नहीं है वो पहले भी सब्जी के दामो से परेशान रहता था आज भी परेशान रहता है 

पिछले दिनों डीजल और एलपीजी  गैस सिलेंडरो की कीमत में बढ़ोतरी  हुई तो उनका कहना था अब घर चलाना कितना मुश्किल हो जायेगा ऐसे तो  उनका कहना सच है  
मैं सोचने लगा कि जब ये सम्पन लोगों की सोच ये है  तो फिर सोचिये उन लोगो का क्या होगा जो प्रतिदिन मजदूरी कर अपने घरो का चूल्हा जलाते है पर वो सिर्फ आपने घर की बात कर रहा था क्योंकि उनसे जुड़े लोगों की परेशानी से वो उतना परेशान नहीं था
क्योंकि वो आज भी जब  नौकरी के लिए बस में सफ़र करता है तो कम पैसे देने की कोशिश करता है डीजल की दामो में किये बढ़ोतरी से बस का किराया बढ़ गया है ये जानते हुए भी कंडेक्टर से ही कहता है कितने किराया बढ़ा दिए हो ऐसे में तो हम कैसे जीयेंगे ऐसे बहस तो रोजाना ही देखने को मिलती  है पर वो वो उस कंडेक्टर की कमाई को अपने दिए किराये से तौलता है कि वो कितना कमा गया 


उसने  अपने गाड़ी का किराया भी बढ़ा दिया है लेकिन ड्राईवर का वेतन ना जाने कब बढेगा ये तो वो ही जानता है कुछ बढ़ोतरी  तो हुई थी लेकिन आज की महंगाई और उनकी आज की कमाई की तुलना में बहुत कम है उनकी सोच है कि कैसे मैं उस ड्राईवर को ज्यादा पैसे दे दूँ ?


उसकी  बड़ी सी  दुकान चौक के बीचो बीच  में है उनका आमदनी भी पहले से अच्छा है और आज जब वो अपने सब सामानों की कीमत बढे  बाज़ार की कीमत में  बेच रहा है फिर भी उसे लगता है कि  महंगाई ने उसे गरीब कर दिया है उसके दुकान में काम करने वाले मजदुर को भी वो बहुत कम पैसे में काम में रखता है जब वे मजदूरी बढ़ाने के लिए बोलते है वो कहता है काम करना है तो काम करो वरना बहुत से लोग पड़े है काम करने के लिए 

उनकी मजदूरी में बढ़ोतरी उनकी मज़बूरी में दब जाती है ये सिलसिला तो हमेशा चलता रहता है उसके दुकान की लाभ तो दिनोदिन बढ़ रही है लेकिन उनके यहाँ काम करने वाले लोगों की मजदूरी  कभी कभी बढती है जो  किस अनुपात में बढ़ रही है समझ में नहीं आता अगर वो आन्दोलन करने की सोचे तो खायेगे क्या और अगर चुपचाप काम करते रहेगे तो भी सोचेंगे की क्या -क्या खाए ?
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अमीर और गरीब के बीच की दूरी का एक  बड़ा कारण ये भी हो सकता है कि लोग आज भी अमीरों के पास मजदूरी बहुत कम पैसे  में करते है 

ये सिर्फ एक सम्पन अमीर की बात है तो फिर जो कम अमीर की श्रेणी में आते है वो क्या कहेंगे वो तो अपने को गरीब ही कहेंगे तो फिर जो असल में गरीब है वो क्या कहेंगे समझ से परे है 

गरीब तो गरीब है पर एक अमीर को  और ज्यादा अमीर बनने में इतना समय लगता है जो  उसे अपने को अमीर मानने में कितना समय लगेगा और एक गरीब  अपने को  गरीब बनाने में कितना समय लगाता है जो उसे अपने को गरीब मानने में कितना समय लगेगा ?

दुनिया में सभी को खाने-पीने रहने जीने का हक है पर क्या सिर्फ खाने-पीने, रहने, जीने का ???
कब इनकी रोज की मज़बूरी एक असल मजदूरी में बदलेगी ?
अमीर का तो ये ही फार्मूला है घोडा घास से दोस्ती करेगा तो खायेगा क्या?

हमारा समाज क्या सोचता है और क्या कर रहा है ये आज की बात नहीं कितने आये और चले गए लेकिन लोगों की मानसिकता के आगे मजबूरियों ने हमेशा से  इनका स्थान को रोके रखा है 
ये सच है कि लोगों के उथान में  चंद लोगो की कोशिश हमेशा से चलती रही है पर कुछ लोग तो इसके आढ़ में मेंभी अपने को अमीर बनाने की ओर कदम बढ़ा दिए है 

आज जब हम अपने विवेक से सारी बातों को समझ बुझ कर जान सकते है लेकिन फिर भी स्वीकार करने में क्यों कतराते है?
 शादी विवाह में तो अपने शानोशौकत दिखाने से नही चुकते पर कुछ तो वहां भी मजदूरो से अपने पैसे का हिसाब किताब में कटौती करवाते है  

उनकी मानसिकता कंजूसी की नहीं है वो तो  सिर्फ एक मानसिकता है कि मैं कैसे इनको ज्यादा पैसा दे दूँ ?
अजीब सी कशिश है इन मजदूरों की खामोशी में  भी जो  सब कुछ सह जाते है चुपचाप 


एक नज़र जिसने मुझे  भी प्रभवित किया है लोगो की सोच किस तेज़ी से बढ़ रही है?
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