सफलता एक ऐसी
चीज़ है जिसे हर व्यक्ति प्राप्त करना चाहता है।
भले ही वह छोटे-छोटे कार्यों में ही
क्यों न हो।
| मैं सोचता हूँ की सौ में नब्बे ऐसे लोग है जो अपनी वाणी में वो मिठास शुद्धता नहीं ला सकते है जो एक सचरित्र व्यक्ति में देखने को मिलते है। |
जिसके
मन में हर समय नए विचार जन्म लेते है वह व्यक्ति सफलता प्राप्त कर सकता है।
हर मनुष्य का जन्म किसी विशिष्ट कार्य के लिए हुआ है। प्रत्येक
मनुष्य के अन्दर एक दिव्य शक्ति छिपी होती है लेकिन स्वयं वह उसे पहचान नहीं पाता है। बरगद का विशाल वृक्ष बरगद के लघु बीज से ही जन्म लेता है। हम अपने लकीर
के फ़क़ीर रहेंगे तो शायद हम कभी उन्नति
नहीं कर पाएंगे।
दुनिया में किसी भी सफल मनुष्य को देखिये वे दूसरों की नक़ल कर
महान नहीं बने,लेकिन उन्होंने स्वयं अपने लिए नए मार्ग का निर्माण किया। लेकिन
अपने बनाये मार्ग पर चलने के लिए अदम्य साहस की जरुरत है। उन्नति करने वाले
प्रत्येक के चरित्र में दो मौलिक गुण
अवश्य होते है - "निर्भयता और नवीनता।" जो पुरानी चीजों, रीतियों, विचारों पद्धतियों से बंधे रहते है , जो अंधविश्वास के
गुलाम होते है, जो डरते है कि कहीं उनका समर्थन कम न हो
जाये, कहीं उनके मतदाता उनके विरुद्ध न हो जाये, वे कभी भी पुराने रिवाज़ को तोड़ने में समर्थ नहीं होते।
हम बहुत बार अपनी असफलता में अवसर को दोष देते है। जब किसी को किसी कार्य
में असफलता मिलती है तो कहते है कि हमें समय नहीं मिला नहीं तो वो कर देते, ये कर देते।
लेकिन
अवसर तो हमें स्वयं निर्माण करना है।
मैं
सोचता हूँ की सौ में नब्बे ऐसे लोग है जो अपनी वाणी में वो मिठास शुद्धता नहीं ला
सकते है जो एक सचरित्र व्यक्ति में देखने को मिलते है। विशेष
कर नवयुवकों में यह दोष पाया जाता है कि वे आगे बढ़कर अपने व्यक्तित्व को
खोलकर दूसरों के सामने व्यक्त करने में असफल रहे है।
नव युवकों में योग्यता की कमी नहीं फिर भी झिझक और शर्म के कारण
उनके गुण मन में ही छिपे रह जाते है
"किसी काम को अधुरा छोड़ने की आदत बुरी है। जो व्यक्ति अपना
आदर्श वाक्य यही बनाता है और सफलता के लिए संघर्ष करता है,वह कभी असफल नहीं होता है।
हम किसी भी काम को
करते है तो हमेशा लाभ की चिंता करते है, जो उचित भी है। लेकिन संसार में कोई भी ऐसा कार्य नहीं जो जोखिम और अनिश्चयता से न भरा हो।
आज लाखों की
संख्या में लोग कॉलेज से डिग्री लेकर निकल रहे है।
यह जरुरी तो नहीं कि सबको सरकारी नौकरियाँ लगे। संसार में जीविका के बहुत से साधन है। आप
व्यापार शुरू कर सकते है लेकिन हाँ, इसमें भी जोखिम और
अनिश्चितता
भरी रहती है।
लोगों की भीड़ में अनेक केवल जनसंख्या बढ़ाने के लिए होते है।
भीड़ को तनिक बढ़ा देने में सहायता करते है लेकिन इस भीड़ में सामान्य से ऊपर दिखाई देने वाले व्यक्ति इने- गिने ही होते है। ये ही वे लोग होते है जो आत्मविश्वास तथा
आत्मनिर्भरता का विकास कर चुके होते है।
हम एक ऐसे युग में जी रहे है जो अदभुत विकास का, आश्चर्य जनक अविष्कारों का और विलक्षण
साहस का युग है। इस युग का आह्वान है - "हम ऊँचे उठें और सफलता के शिखर पर पहुंचे। जिन सीढ़ियों पर हमको
चढ़कर ऊपर पहुंचना है, वे संभवतः हमारे
समीप ही हैं। हर जगह अवसर हमारी प्रतीक्षा कर रहे हैं। वह हमारे अपने अंतःकरण में
है। वह हमारे वातावरण में नहीं, परिस्थितियों
में नहीं, हमारे ह्रदय में है। इसे न भाग्य कहते है, न किस्मत, न चांस कहते है, न अवसर, न दूसरों की सहायता कहते है न सिफारिश ...... इसे
कहते है कर्मठता या कर्मपरायणता।।
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