कितना बदल गया रे आज समाज
भाग दौड़ और आगे रहने की रेस में सब है आगे...
पर कौन पिछड़ गया रे आज...?
इस इंसान को इंसान ने ही हरा दिया
जो इंसान होके भी इंसानियत की सोच तक को भूला गया
आज की ये जिन्दगी कल की उधार है
तो फिर क्यों ना हम एक बार
कल की जिन्दगी के बारे में सोच लें...
बहते खुशी के लम्हों में
क्यों ना हम अपनों के दुःखों को भी आज बहा दें...
आपसी प्यार-मिलाप और सहयोग से
क्यों ना हम बैर- घृणा और कपट को आज मिटा देँ...
छूट रहे हाथों को मजबूती से पकड़ क्योँ ना.....
आधी बातें....
क्योँ ना पूरी करें .....
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