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रविवार, 24 फ़रवरी 2013

मैं भी बदल...

अतीत की बातें और भविष्य की कल्पनाओं में डूबा शामो सवेरे
इस कदर खोया रहा मानो जीवन सिर्फ गमो से भरा हो
रास्ते में मैं जब उसके चेहरे के भाव पढने की चेष्टा करता हूँ
तो आत्म ग्लानी के भाव दीख पड़ते है
शहर में बस अब उनकी यादें ही रह गई है

कितनी ख़ुशी से गुजर रहे थे वो दिन आज बस यादें ही है
मिल कर तो कितनी प्रसन्नता होती है लेकिन साथ बिताये पलों की याद कर
आंखें बस नम हो जाती है कितनी नजदीकियां हुआ करती थी, बातों का सिलसिला
थमने का नाम नहीं लेती थी
समय के साथ हालात और लोग भी बदल जाते है तो मैं क्या चीज़ था मैं भी
बदल......///w\\\

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