भोली सुरत पर! मुरझाए से चेहरे लिए आँखों में दर्द के बिताए पलों के नमी लिए गँदे पुराने कपड़े में एक नन्ही सी जिन्दगी आशा से हाथों को फैलाए कि कुछ मिल जाए, स्टेशन पर इधर - उधर घूम रही थी
पास आने पर 5 का सिक्का देने पर माँ से भी बड़ी बड़ी आर्शीवाद के वचनों की बोली बोल कर आगे बढ़ गयी.....
उसकी ना तो जमीं है और ना ही आँसमा
पर है वो हैं इसी जहां की
हर कदम उठते है सिर्फ भूख मिटाने के लिए
हाथों की लकीरों में ना जाने क्या लिखा है
पर तकदीर ने उन्हें ऐसे राह पे छोड़ा है
कि जिन्दगी अभी और है उनके जीने के लिए
मेहनत और ईमानदारी गहना है उनका
पर टुकराए ऐसे जाती है कि.......
फिर तो दुनिया के सारे दोष इनके ही निकलते है
अपनों में प्यार भी गुस्सा में निकालती है
उनके गालियों मेँ भी बस दर्द की दस्ताँ बयान होते है
फिर तो बुरी नज़रों से भी ......
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रवि बेक
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हर राह पे उनकी कहानी एक-सी है
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